दिखाई कम दिया करते हैं बुनियाद के पत्थर
ज़मीं में जो दब गए इमारत उन्हीं पे क़ायम है

मैं आईना हूँ टूटना मेरी फितरत है
इसलिए पत्थरों से मुझे कोई गिला नहीं

पागल हो जाने का भी गज़ब फायदा है साहब
लोग पत्थर तो उठाते हैं मगर उँगली नहीं

हटाए थे जो राह से दोस्तों की
वो पत्थर मेरे घर में आने लगे हैं

कभी पत्थर के ख़ुदा कभी पत्थर के इनसान
तो कभी पत्थर के सनम मिले
बेमंज़िल जिंदगी के हर मोड़ पर
नाम बदल बदल के गम मिले

अब वफ़ा का नाम न ले कोई हमें बेवफ़ा की तलाश है
पत्थर का दिल सीने में हो हमें उस ख़ुदा की तलाश है

न उसने मुड़कर देखा न हमने पलटकर आवाज दी
अजीब सा वक़्त था जिसने दोनों को पत्थर बना दिया

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढ़े
पत्थर की तरह बेहिसओबेजान सा क्यों है

पत्थर दिल शायरी

मोहब्बत करनेवालों को दीवाना कह दिया
प्यार में जलनेवालों को परवाना कह दिया
दफना दिया मोहब्बत को पत्थरों के नीचे
लोगों ने उसे मुमताज का आशियाना कह दिया

बदलती रहती हैं हकीकतों की बारिश वक़्त के साथ
काश उम्मीदों के घरौंदे समझ के पत्थरों से बनाते

मुझमें नहीं ख़ुदा में भी फर्क है
एक रास्ते पे रखा है एक महँगे पत्थरों में दर्ज है

हमने हमारे इश्क़ का इज़हार यों किया
फूलों से तेरा नाम पत्थरों पे लिख दिया

मेरा गाँव भी तिरे शहर जैसा हो गया है
यहाँ भी हर आदमी पत्थर जैसा हो गया है

जो गूजरे शहर से तेरे तो ख़याल आया
कभी हमने भी पत्थरों से मोहब्बत की थी

ज़माना चाहता है क्यों मेरी फ़ितरत बदल देना
इसे क्यों ज़िद है आख़िर फूल को पत्थर बनाने की

अब वफ़ा का नाम न ले कोई हमें बेवफ़ा की तलाश है
पत्थर का दिल सीने में हो हमें उस ख़ुदा की तलाश है

कहाँ रखूँ मैं शीशे सा दिल अपना
हर किसी के हाथ में पत्थर नज़र आता है

रेत पर नाम लिखते नहीं
रेत पर लिखे नाम कभी टिकते नहीं
लोग कहते हैं पत्थर दिल हैं हम
लेकिन पत्थरों पर लिखे नाम कभी मिटते नहीं

इतनी चाहत के बाद भी तुझे एहसास न हुआ
जरा देख तो ले दिल की जगह पत्थर तो नहीं

पत्थरों से प्यार किया नादान थे हम
ग़लती हुई क्योंकि इनसान थे हम
आज जिन्हें नज़रें मिलाने में तकलीफ़ होती है
कभी उसी शख़्स की जान थे हम

हमारी मोहब्बत को तुम यों नज़रअंदाज न करो
हम तो वो इनसान है जो पत्थरों में भी जान डाल देते हैं

कभी नज़रअंदाज़ मत करो उसको
जो तुम्हारी बहुत परवाह करता हो
वरना किसी दिन तुम्हें एहसास होगा
कि पत्थर जमा करते-करते तुमने हीरा गवाँ दिया

रस्मे उल्फ़त को निभाने की ज़रूरत क्या है
यह तो पत्थर है मनाने की ज़रूरत क्या है
साथ में भीड़ लगाने की ज़रूरत क्या है
हो यकीन खुद पे ज़माने की ज़रूरत क्या है

उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता
हजारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता
बिछड़ते वक़्त कोई बदगुमानी दिल में आ जाती
उसे भी ग़म नहीं होता मुझे भी ग़म नहीं होता

जख्म पाकर सिर झुका देता हूँ
जाने कौन पत्थर ख़ुदा बन जाए

ऐ ख़ुदा लोग बनाए थे पत्थर के अगर
मेरे एहसास को शीशे का न बनाया होता

जिन पत्थरों को कभी हमने दी थी धड़कनें
आज उनको जुबां मिली तो हम पर बरस पड़े

गर लफ़्ज़ों में कर सकते बयान इंतेहा-ए-दर्द-ए-दिल
लाख तेरा दिल पत्थर का सही कब का मोम कर देते

हथेली पर रखकर नसीब तू
क्यों अपना मुकद्दर ढूँढ़ता है
सीख उस समंदर से जो
टकराने के लिए पत्थर ढूँढ़ता है

हाथों में पत्थर नहीं फिर भी चोट देती है
ये जुबान भी अजीब है अच्छे अच्छों के तोड़ देती है

कितना ग़म जदा रहा हूँ तेरी जुदाई में सनम
मेरे हालात देखकर पत्थर भी पिघल जाते

दिल आने की बात है यारो अपने बस की बात कहाँ
प्यार अगर हो पत्थर से फिर हीरे की औकात कहाँ

तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

दर्द ओ ग़म से हमेशा के लिए पीछा छुड़ा लिया
बार बार टूट जाता था दिल पत्थर का बना लिया

दर्द भी वो दर्द जो दवा बन जाए
मुश्किलें बढ़ें तो आसां बन जाए
ज़ख्म पाकर सिर झुका देता हूँ
जाने कौन पत्थर खुदा बन जाए

लोग कहते थे मेरा दिल पत्थर का है
यकीन मानिए कुछ लोग उसे भी तोड़ गए

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

पत्थर हूँ मैं चलो मान लिया तुम तो हुनरमंद थे
तराशा क्यों नहीं मुझे

दिल में कुछ अरमान थे मगर बेदर्द इनसान थे
अपना गुज़ारा कैसे होता काँच का दिल था पत्थर के मकान थे

पत्थर सा दिल कहाँ से लाऊँ
कंक्रीट की बस्ती में निभ पाऊँ

तराशने वाले पत्थरों को भी तराश देते हैं
नासमझ हीरे को भी पत्थर करार देते हैं

गर पत्थर है तू तो मुझे पत्थर कबूल है
तेरे सदके मैं अपनी सारी इबादतें कर दूँ

पत्थर से प्यार किया नादान थे हम
ग़लती हुई क्यों की इनसान थे हम
आज जिन्हें नज़रे मिलाने में तकलीफ़ होती है
कभी उसी शख़्स की जान थे हम

अपनी नाराज़गी पत्थर सी नहीं
बर्फ सी रखिएगा जो कुछ देर में ही पिघल जाए

बेहतर से बेहतर कि तलाश करो
मिल जाए नदी तो समंदर कि तलाश करो
टूट जाता है शीशा पत्थर कि चोट से
टूट जाए पत्थर ऐसा शीशा तलाश करो

कोई पत्थर की मूरत है किसी पत्थर में मूरत है
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी खुबसूरत है

अब कहा ज़रूरत है हाथों में पत्थर उठाने की
तोड़नेवाले तो जुबान से ही दिल तोड़ देते

इस अजनबी शहर में पत्थर कहाँ से आया है
लोगों की भीड़ में कोई अपना ज़रूर है

तेरे शहर के कारीगर बड़े अजीब हैं ए दिल
काँच की मरम्मत करते हैं पत्थर के औजारों से

वाकई पत्थर दिल ही होते हैं शायर
वर्ना अपनी आह पर वाह सुनना कोई मज़ाक नहीं

लोग कहते हैं कि मेरा दिल पत्थर का है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसे भी तोड़ गए

पत्थरों से न किसी पे चार कर
हो सके तो तू सभी से प्यार कर

ख़ता ए इश्क़ नहीं देखता महबूब पत्थर है या कोहिनूर है
गर इश्क़-इश्क़ है तो हर हाल में मंजूर है

जरा सा भी नहीं पिघलता दिल तेरा
इतना कीमती पत्थर कहाँ से खरीदा है

चुप हैं किसी सब्र से तो पत्थर न समझ हमें
दिल पे असर हुआ है तेरी हर एक बात का

देखो यु रूठा न करो मेरा दिल दुखता है
मेरा दिल भी दिल हैं कोई पत्थर तो नहीं

शायद कोई तराश कर मेरी क़िस्मत सँवार दें
यह सोचकर हम उम्र भर पत्थर बने रहे

कोई मुझे भी पत्थर सा दिल ला दो यारो
आख़िर मुझे भी इनसानों की बस्ती में ही जीना है

हमारा दिल ऐसे टुटा है
जैसे किसी ने मार दिया हो शीशे पे पत्थर
फिर भी लिखा है हर टुकड़े पे
आपके नाम का अक्षर

कभी पत्थर कहा गया तो कभी शीशा कहा गया
दिल जैसी एक चीज़ को क्या क्या कहा गया

पत्थर की दुनिया जज़्बात नहीं समझती
दिल में क्या है वो बात नहीं समझती
तनहा तो चाँद भी है सितारों के बीच में
पर चाँद का दर्द वो रात नहीं समझती

वह पत्थर भी मारे तो झोली भर लेंगे
महबूब के तोहफे को कभी ठुकराया नहीं करते

फिर यों हुआ कि दर्द की लज्जत भी छिन गई
एक शख़्स ने मुझे मोम से पत्थर बना दिया

दर्द ए दिल पिघलेंगे पत्थर भी मोहब्बत की तपिश पाकर
बस यही सोचकर हम पत्थर से दिल लगा बैठे

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे

मैं शीशा हूँ तू पत्थर है तू मेरा अहले मुकद्दर है
मैं जिऊँगा या मर जाऊँगा ये फ़ैसला तेरे ऊपर है