अजीब कशमकश है जान किसे दें
वो भी आ बैठे और मौंत भी

सोचा था तड़पाएंगे हम उन्हें
किसी और का नाम लेके जलाएंगे उन्हें
फिर सोचा मैंने उन्हें तड़पाके दर्द मुझको ही होगा
तो फिर भला किस तरह सताए हम उन्हें

शायरी शौक नहीं
और नाही कारोबार मेरा
बस …
दर्द जब सह नहीं पाता तो लिख देता हूँ

तुझसे अच्छे तो जख्म हैं मेरे
उतनी ही तकलीफ देते हैं जितनी बर्दाश्त कर सकूँ