एक दो जख्म नहीं जिस्म है सारा छलनी
दर्द बेचारा परेशाँ है कहाँ से निकले

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना चलता रहता है
जीना मरना खोना पाना चलता रहता है

और क्या कहूँ तुझको मैं
खुद भी किसी लायक नहीं
बस मुझे अपना समझ लेना
जब तुझे किसी लायक न छोड़ जाए
तेरे जिस्म को कुतरने वाले

मुझे तलाश है एक रूह की जो मुझे दिल से प्यार करे
वरना जिस्म तो पैसो से भी मिल जाया करते हैं

जिस्म पर जो निसान है जनाब
वो तो सारे बचपन के है
बाद के तो सारे दिल पर लगे है

जख्म ही देना था तो पूरा जिस्म तेरे हवाले था
लेकिन कम्बख़्त ने जब भी वार किया दिल पर ही किया

मेरे जिस्म से उसकी खुशबू आज भी आती है
मैंने फुरसत में कभी सीने से लगाया था उसे

अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है
जिस्म से आग निकलती है क़बा गीली है

पीते पीते ज़हर-ए-ग़म अब जिस्म नीला पड़ गया
कुछ दिनों में देखना हम आसमां होने को हैं

ज़हर भी है एक दवा भी है इश्क़
तुझसे और तुझ तक मेरी रज़ा है इश्क़
जिस्म छूकर तो हर कोई एहसास पा जाए
रूह तक महसूस हो वो नशा है इश्क़

रूहानी इश्क़ होता है, जब जिस्म की प्यास नहीं होती
हवा का रंग नहीं होता इश्क़ की जात नहीं होती

अगर मोहब्बत का शौक रखते हो तो दिल से रखो
जिस्म के दीवाने तो यहाँ जानवर भी होते हैं

हम अपनी रूह तेरे जिस्म में छोड़ आए फ़राज़
तुझे गले से लगाना तो एक बहाना था

किया था वादा दोनों ने जीना मरना हैं एक साथ
मेरा जिस्म नीला पड़ा और उनके हुए पीले हाथ

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजु क्या है

जिस्म को जिस्म की ही तलाश है
इसे इश्क़ न कहो ये महज प्यास है

मौत की शह देकर तुमने समझा अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार के सौंप दिया और रूह बचा ली

ओझल हुआ मैं उनकी नज़र से तो यों लगा
जैसे जिस्म से जान जुदा हो गई

मैं सोचती हूँ कि इक जिस्म के पुजारी को
मेरी वफ़ा ने बफ़ा का सुहाग क्यों समझा

तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको
तमाम खेल मोहब्बत में इंतज़ार का है

रात को वो थकन से लड़ता है
जिस्म दिन भर जेहन से लड़ता है

फ़िकर तेरी भी होती है मुझको कभी-कभी
न जाने किस मोड़ पर तुझको छोड़ जाए
तेरे जिस्म को चाहने वाले

तमन्ना तेरे जिस्म की होती तो छीन लेते दुनिया से
इश्क़ तेरी रूह से है इसलिए ख़ुदा से माँगते हैं तुझे

अब उसे न सोचू तो जिस्म टूटने सा लगता है
एक वक़्त गुज़रा है उसके नाम का नशा करते करते

जब यार मेरा हो पास मेरे मैं क्यों न हद से गुज़र जाऊँ
जिस्म बना लूँ उसे मैं अपना या रूह मैं उसकी बन जाऊँ

सिझ रहे हैं अरमान गरम जिस्म की सिगड़ी में
सर्द रातों में दिल की आँच एकदम बराबर है

रूह की आड़ में जिस्म तक नोच खाते हैं लोग
प्यार के नाम पर हवस की आग बुझाते हैं लोग

इनसान के जिस्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा दिल है
और अगर वो ही साफ़ न हो तो चमकता चेहरा किसी काम का नहीं

इंतज़ार तो प्यार में वही कर सकता है
जिसमें सिर्फ़ दिल से प्यार किया हो जिस्म से नहीं

जो मेरे दिल में है तेरे दिल में भी वही आरज़ू चाहिए
मोहब्बत में मुझे सिर्फ़ जिस्म नहीं तेरी रूह चाहिए

मैं दिल हूँ तुम साँसे मैं जिस्म हूँ तुम जान
मैं चाहत हूँ तुम इबादत मैं नशा हूँ तुम आदत

सच पूछो तो एक बात बताऊँ
अब जिस्म का तमाशा है मोहब्बत मर चुकी है।

कौन कहता है कि तुम दूर हो मुझसे
मैं जिस्म हूँ तो जान हो तुम मेरी

महकता हुआ जिस्म तेरा गुलाब जैसा है
नींद के सफर में तू ख़्वाब जैसा है

रख दी हैं उसने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब
सादा बरक़ पे ले कोई मंज़र उतार दे

किसी के जिस्म को चिथड़ा तक नहीं हासिल
किसी की खिड़कियों के परदे भी मख़मल के होते हैं

इश्क़ ज़िस्मानी खेल बन के रह गया
पनघट किनारे इंतज़ार करने के ज़माने चले गए

जिस्म से होनेवाली मोहब्बत का इजहार आसान होता है
रूह से हुई मोहब्बत समझने में जिंदगी गुज़र जाती है

भरोसे के एहसास पर जिंदा रहती है मोहब्बत
साँसो से तो सिर्फ़ जिस्म चलता है

सपना है आँखों में मगर नींद कहीं और है
दिल तो हैं जिस्म में मगर धड़कन कहीं और है

न हवस तेरे जिस्म की न शौक तेरी ख़ूबसूरती का
बेमतलबी सा बंदा हूँ बस तेरी सादगी पे मरता हूँ

जिस्म तो बहुत सँवार चुके रूह का सिंगार कीजिए
फूल शाख से न तोड़िए खुशबूओं से प्यार कीजिए

जिस्म से रूह तक जाए तो हकीकत है इश्क़
और रूह से रूह तक जाए तो इबादत है इश्क़

तेरा वजूद दिल में कुछ इस तरह है
के जिस्म में खून के बजाय तेरी यादें बहती हैं

किसी का ऐब तलाश करनेवाले मिसाल उस मक्खी के जैसी है
जो सारा खूबसूरत जिस्म छोड़ सिर्फ़ ज़ख्म पर बैठती है

जिस्म बना लूँ उसे मैं अपना या रूह मैं उसकी बन जाऊँ
लबों से छू लूँ जिस्म तेरा साँसों में साँस जगा जाऊँ
तू कहे अगर इक बार मुझे मैं खुद ही तुझमें समा जाऊँ

ख़ाक थी और जिस्म ओ जाँ कहते रहे
चंद ईंटों को मकाँ कहते रहे

जिस्म की दरारों से रूह नज़र आने लगी है
बहुत अंदर तक तोड़ गया है इश्क़ तुम्हारा

आज जिस्म में जान है तो देखते नहीं हैं लोग
जब रूह निकल जाएगी तो कफन हटा-हटाकर देखेंगे लोग

किसी से जुदा होना इतना आसान होता तो
रूह को जिस्म से लेने फ़रिश्ते नहीं आते

इश्क़ जिस्म से नहीं रूह से किया जाता है
जिस्म तो एक लिबास है ये हर जनम बदल जाता है

दर्द गूँज रहा दिल में शहनाई की तरह
जिस्म से मौत की ये सगाई तो नहीं

कुछ इस तरह से बसे हो तुम मेरे अहसासों में
जैसे धड़कन दिल में मछली पानी में रूह जिस्म में

मेरा वजूद मिट रहा है इश्क़ में तेरे
अब यह न कहना की जिस्म की चाहत है मुझे

मत रख हमसे वफ़ा की उम्मीद
हमने हर दम बेवफ़ाई पाई है

मत ढूँढ़ हमारे जिस्म पे जख्म के निशान
हमने हर चोट दिल पे खाई है

बढ़ती उमर का इश्क़ और ढलती उमर की ख़्वाहिश
खूबसूरत जिस्म नहीं खूबसूरत साथ ढूंढ़ता है